Description
कविता मेरे अंदर कब जन्मी, कब पनपी और कब इतनी बड़ी हो गई मुझे ख़ुद नहीं मालूम। इसे लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? क्या ये मेरे वंशानुगत था- मुझे कुछ याद नहीं। मैं अपने बारे में दावा तो नहीं करती पर इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि मैंने जो लिखा है दिल से लिखा है और पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ लिखा है। मुझे मालूम है कि मेरी कविताएँ आपको बहुत अच्छी लगेंगी। मेरी हर कविता में अलग-अलग भाव हैं और मैंने इन सारी भावनाओं को जिया है। हो सकता है आप कुछ को पढ़कर भावूक हो जाएं। अंत में आपको यह कविताएं पसंद आएंगी। शब्द ही हैं जो मुझे आप तक पहुँचा सकते हैं इसलिए मैंने शब्दों को रचा है और उससे कविता बनाकर आप तक पहुँचने की कोशिश की है। कविता को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सर्वोच्च रूप कहा जाता है। मेरी बहुत सी कविताओं में मेरी ही आत्मभिव्यक्ति है क्योंकि ज़्यादातर मैंने अपने ही अनुभव लिखे हैं। मुझे जो सही लगा वही लिखा है। मैं अपने आसपास के ही विषयों को चुना है कविता के लिए। याद है मुझे जब मैं अपने जीवन की पहली कविता ‘पेड़ और हम’ लिखी थी और इसे मैंने कुछ घंटो में लिखा था। जिसने कभी कविता नहीं लिखी उसके लिए कुछ घंटो में एक कविता लिख लेना बहुत बड़ी बात है। इसी तरह मेरी एक और कविता ‘काश मौत भी एक बीमारी होती’, यह मैंने पापा के गुज़र जाने के बाद (यह अक्षरशः सही है दुनिया का हर अच्छा सिलसिला हमेशा के लिए वैसा नहीं रहता) गद्य में पहले लिखा था फिर बाद में इसी लाइन को लेकर कविता बनाई। अब जब एक बार लिखा तो आगे भी लिखने लगी। मानो शब्द मेरे अंदर बीज की तरह पड़े थे, थोड़ा सा माहौल या अपनी ज़िंदगी के पलों को याद किया या थोड़ी कल्पनाओं का सहारा लिया तो खिलखिला कर लहरा उठे। अपने मन की भावनाओं को कविता में ढालना एक अलग ही ख़ुशी देती है। प्रेम ही एक ऐसा भाव है जो सबके जीवन में आता है। या यूँ कहें की ज़िंदगी के इतनी भाग दौड़ में, खट्टे – मीठे अनुभव,में प्रेम की चंद बूँदें भी हमें शक्ति, शांति, सांत्वना, सुख, सबक़ और स्थिरता का आभास देती है। क्योंकि मनुष्य का पहला और आख़िरी कर्तव्य यही है और आत्मा का मूलस्वरूप भी यही है। फिर भी मैंने एक छोटी सी कोशिश की है। बहुत दिनों की मेहनत के बाद एक रचना की है। मेरी बहुत सी कविताएँ बहुत छोटी हैं। इसका कारण यह है की मेरे मन में जिस समय जितना विचार या भाव आया उतना ही लिख दिया उसको बाद में बड़ा बनाने की कोशिश कभी नहीं की। मैंने अपनी कविताओं में सरल भाषा का उपयोग किया है जैसा मैं सोचती हूँ वैसा ही लिखा है। अगर इसमें कोई व्याकरण या कोई भी ग़लती लगे तो मुझे माफ़ करिएगा। अपने में कोई पूर्ण नहीं है। हम सभी रोज़ कुछ न कुछ सीखते हैं। अगर मेरी कविता का कुछ भी अंश या भाग किसी भी पाठक के दिल को छूता है या उसके मन को भिगोता है तब मुझे लगेगा की मेरी इतने दिनों की मेहनत बेकार नहीं गई। मुझे मालूम नहीं है की मुझे कहाँ तक सफलता मिलेगी पर सफलता की आशा तो कर ही सकती हूँ…।
– स्वाती शशि












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